अंग्रेजी में गर्व, हिंदी में झिझक… आखिर क्यों कमजोर हो रही अपनी मातृभाषा?

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बराड़ा। हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, संवेदनाओं और सामाजिक पहचान की भाषा है। इसके बावजूद बदलते दौर में हिंदी को लेकर एक अजीब-सा विरोधाभास दिखाई देता है। घर में बच्चे हिंदी बोलते हैं, भावनाएं हिंदी में व्यक्त करते हैं, लेकिन स्कूल, नौकरी और आधुनिकता की दौड़ में अंग्रेजी को सफलता और प्रतिष्ठा का पर्याय मानने लगे हैं। हिंदी दिवस पर यह सवाल विचारणीय है कि आखिर जिस भाषा को करोड़ों लोग सहजता से बोलते और समझते हैं, उसी भाषा को लेकर हीनभावना क्यों पैदा हो रही है? आज शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मांग बढ़ रही है। अभिभावकों को लगता है कि अंग्रेजी में शिक्षा ही बच्चों के बेहतर भविष्य की गारंटी है। इसका असर यह हुआ है कि कई बच्चे हिंदी पढ़ तो लेते हैं, लेकिन उसे प्रभावी ढंग से लिखने और अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में कठिनाई महसूस करते हैं। दूसरी ओर सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया ने भाषा के स्वरूप को भी बदल दिया है। हिंदी के शब्द रोमन लिपि में लिखे जाने लगे हैं और धीरे-धीरे हिंदी लेखन से दूरी बढ़ रही है।
 मातृभाषा सीखने की पहली सीढ़ीः-बच्चे के सीखने की पहली सीढ़ी उसकी परिचित भाषा ही होती है। प्रारंभिक वर्षों में यदि बच्चे को अपनी भाषा में सोचने, बोलने, सुनने और पढ़ने का पर्याप्त अवसर मिले तो उसकी सीखने की नींव मजबूत होती है। भाषा जितनी सहज और आनंददायक होगी, बच्चा उतनी ही रुचि से उसे अपनाएगा। हिंदी को मजबूत करना केवल हिंदी विषय को मजबूत करना नहीं, बल्कि बच्चों की समझ और अभिव्यक्ति को मजबूत करना भी है।
:- पूजा तलवार, एफ.एल.एन लीड, लैंग्वेज एंड लर्निग फाउन्डेशन।

मातृभाषा में सहजता से रख सकते है बातः-हमें स्कूलों में हिंदी को केवल एक विषय मानकर पढ़ाने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। बच्चों को हिंदी से जोड़ने के लिए उन्हें रटने के बजाय कहानी, कविता, संवाद और गतिविधियों के माध्यम से भाषा सीखने का अवसर देना चाहिए। जब बच्चा अपनी बात अपनी भाषा में सहजता से कह पाता है, तभी भाषा उसके लिए जीवंत बनती है। हिंदी भाषा की मजबूती की शुरुआत कक्षा से ही हो सकती है।

:- रेनू स्कूल टीचर।

समाज में हिंदी को सम्मान देना जरूरीः-किसी भाषा की स्थिति केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे कितने लोग बोलते हैं, बल्कि इससे भी तय होती है कि समाज उस भाषा को कितना सम्मान देता है। आज कई परिवारों में अंग्रेजी बोलने को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया गया है, जबकि हिंदी बोलने में लोग कभी-कभी संकोच महसूस करते हैं। दूसरी भाषाएं सीखना अच्छी बात है, लेकिन दूसरी भाषा का ज्ञान अपनी मातृभाषा या हिंदी के प्रति हीनभावना का कारण नहीं बनना चाहिए।

– डॉ नेहा बठला, मास्टर ट्रेनर।

सोशल मीडिया पर हिंदी की उपस्थिति जरूरीः-  हिंदी की सबसे बड़ी चुनौती शब्दों की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रति बदलती सामाजिक मानसिकता है। बच्चों को यदि शुरू से यह संदेश मिले कि हिंदी केवल परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि विचार करने और अपनी बात कहने की प्रभावी भाषा है, तो उनका इस भाषा से संबंध मजबूत होगा। उनका मानना है कि हिंदी को आधुनिक तकनीक, इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल कंटेंट से जोड़ना समय की जरूरत है। आज की पीढ़ी जिस माध्यम पर सबसे अधिक समय बिताती है, हिंदी की उपस्थिति वहां उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। भाषा को बचाने के नाम पर उसे केवल परंपरा से जोड़ने के बजाय आधुनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित करना होगा।

:- डॉ अन्विति सिंह, डिस्लेक्सिया एक्सपर्ट और तकनीकी सलाहकार, मॉडर्न इन्स्टीटियूट फॉर एजूकेशन

भाषा ही हिन्दुस्तानियों की पहचान

किसी भी देश की मातृभाषा उस देश की पहचान होती है लेकिन विश्व गुरू कहे जाने वाले भारत देश में ही सरेआम उसकी राष्ट्रभाषा को अपमान किया जाता है। हिंदी को बोलने व पढऩे पर असभ्य होने का प्रतीक समझा जाना लगा है। हमें न केवल अपनी मातृभाषा हिंदी को बचाना होगा बल्कि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयास करना होगा। सरकारों को भी इस दिशा में कड़े कदम उठाकर राष्ट्रभाषा के अस्तित्व की रक्षा करनी चाहिए।
– डॉ. पूजा शर्मा, प्रोफेसर, एमपीएन कॉलेज। 
हिंदी की चुनौती अंग्रेजी से प्रतिस्पर्धा करने की नहीं, बल्कि अपने महत्व को बनाए रखने की है। हिंदी को रोजगार, तकनीक, शिक्षा, साहित्य और डिजिटल माध्यमों से मजबूती से जोड़ना होगा। नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि अंग्रेजी जानना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन हिंदी से जुड़ा होना अपनी जड़ों से जुड़ा होना है।  हिंदी दिवस केवल एक दिन हिंदी बोलने या हिंदी के सम्मान की बातें करने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन होना चाहिए। यदि हिंदी को वास्तव में मजबूत बनाना है तो इसकी शुरुआत सरकारी कार्यालयों से पहले हमारे घरों, स्कूलों और सोच से करनी होगी। हिंदी को बचाने की जरूरत नहीं, उसे सम्मान देने और जीवन में सहजता से अपनाने की जरूरत है।